
दो मर्दों की लड़ाई
“हम किसी और से क्या अपेक्षा करें कि वो बदलाव लाए, हम ख़ुद ही इस मर्दानगी की लड़ाई का हिस्सा ना बन कर इस प्रकार के विचारों को ख़त्म कर सकते हैं।”
जब हम सुनते हैं कि दो मर्दों ने लड़ाई की, तो हमारे दिमाग में पहली बात क्या आती है? वो यह कि सत्ता या साधन, संसाधन के लिए उन्होंने ऐसा किया होगा। परन्तु क्या हम सोच सकते हैं, कि एक प्रेमी तथा प्रेमिका के पिता के बीच भी जो लड़ाई है, वो भी मर्दानगी की ही लड़ाई है, जिसमें सवाल यह है कि कौन ज़्यादा प्रेम करता है।
इसी प्रकार आज की लड़ाई की शुरुआत तब होती है, जब हम सब बिना सोचे-समझे—जिसे आलस्य भी बोल सकते हैं—जो सब कर रहे हैं, उसी राह पर चले जाते हैं। यहाँ मैं बात करना चाहूँगा युवा लड़कों की, जो जाने-अनजाने समाज में चल रहे कार्यों को यूँ ही अपना लेते हैं। जब लड़की के पिता को ये पता लगता है कि कोई उनसे भी ज़्यादा उनकी बेटी को प्रेम कर सकता है, तो ये बात उनके लिए एक अस्तित्व की लड़ाई बन जाती है। कुछ लोग जो अपने आप को तथाकथित सभ्य समाज का सदस्य मानते हैं, उनके विचार में यह बात गलत लग सकती है, परंतु जब बात सभी की करें, और ख़ासकर भारतीय समाज की, तो मामला कुछ अलग नज़र आता है।
इसी प्रकार हिन्दी सिनेमा ने भी युवाओं में एक अलग भावना पैदा कर दी है। जैसे पहले बताया जा चुका है कि युवा आज आलस्य से ग्रसित है, वो सोचने या समझने की कोशिश नहीं कर रहा। हिन्दी सिनेमा में तीन घंटे की प्रेम कथा को देख कर लोगों को लगता है कि प्रेम आसान है, और सिनेमा की तरह वो भी कर लेंगे। परन्तु क्या तीन घंटे में उसे सभी नज़रियों से दिखाया जा सकता है? और क्या सब कुछ जो सिनेमा में दिखाया जाता है, वह सत्य है? और यहीं से शुरुआत होती है अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे, अपनी ही बेटी के जीवन में सबसे अधिक प्रेम करने वाले पिता, और सिनेमा को देख उमड़े, प्रेम को न समझ कर वही सभी से शक्तिशाली और बड़ा प्रेमी है, ऐसा सोचने वाले प्रेमी के बीच। और यह तो उन कई बातों में से निकली बस एक बात है, जिसे हम साफ़-साफ़ समाज में देख सकते हैं। असल बात यह है कि दोनों इस बात से बेफ़िक्र हो जाते हैं कि जिसे पाने की वे कोशिश कर रहे हैं उसका क्या मानना है, वे दोनों तो मानो उसका सौदा कर रहे हैं।
वे पिता अपने अस्तित्व की लड़ाई से अलग होकर देखें तो उन्हें समझ आएगा कि वे ख़ुद को कितना ही उदारवादी या कल्याणकारी कह लें, परंतु आज भी वे पितृसत्तात्मक समाज की डोर से बंधे हुए हैं। यदि हम इस बारे में सोचें तो हमें सबसे बड़ा कारण घमंड का अभाव समझ में आता है। हम जैसा रीतिरिवाज देखते हैं, या जैसा हमें दिखाया गया है, बस उसी को बिना जाने बोलने की कोशिश करते रहते हैं। जैसे अगर हमारे परिवार में किसी के साथ पहले कुछ हुआ हो या किसी के कुछ विचार हों, ख़ासकर नौजवान लड़के, जो बस अपने बड़े भाई या पिता को ही देखकर बड़े होते हैं, उनके विचारों को अपना लेते हैं। संभावना है कि विचार सही हो सकते हैं, परन्तु सवाल गलत होने की संभावना का भी है। समय के साथ विचारों में भी कुछ बदलाव ज़रूरी होते हैं।
बात करें घमंड की तो हम सब में घमंड होना चाहिए। यह घमंड ही है कि वो मैं ही हूँ जो इस समाज को बदल सकता है, जो तथाकथित सभ्य समाज को बदल सकता है। हम किसी और से क्या अपेक्षा करें कि वो बदलाव लाए, हम ख़ुद ही इस मर्दानगी की लड़ाई का हिस्सा ना बन कर इस प्रकार के विचारों को ख़त्म कर सकते हैं। अगर सच में मर्दों की लड़ाई है, तो सबसे पहले इस शब्द को ही समाप्त करना होगा, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ़ दो लोगों की ही नहीं है, ये लड़ाई इस समाज को कहाँ तक बदला जा सकता है, उसकी है।
This article was originally published in AAWAZ Magazine (2024). Copyright © 2024 Karan Pareek. Republished here with permission of the author. All rights reserved.